Monday, July 17, 2017

जातिवादी अतिवाद का वर्तमान दौर कहाँ जाकर थमेगा ?

जातिवादी अतिवाद का वर्तमान दौर कहाँ जाकर थमेगा ?

समाज की व्याख्या करते हुए कभी इमाइल दुर्खिम ने ये नहीं सोचा होगा कि लोग समाज की व्याख्या अपने हिसाब से करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वार्थ से भी जोड़ लेंगे। समाजशास्त्रियों ने कभी ये नहीं सोचा होगा कि समाज के नाम पर सिर्फ जातिवाद ही हावी हो जाएगा और समाज की वृहद व्याख्या बिल्कुल संकुचित हो जाएगी।  
      पिछले काफी दिनों से हमारे राजस्थान में एक जाती विशेष के लोग आंदोलन कर रहे हैं। एक ऐसे मुद्दे पर ये आंदोलन चल रहा है जो कानूनी ढंग से भी सुलझाया जा सकता है। कानूनी रूप से भगोड़ा घोषित किए हुए एक अपराधी की पुलिस कार्रवाही में मौत हो जाती है और उसकी मौत पर कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा भड़काने वाले वीडियो फेसबुक पर, व्हाट्सअप पर अपलोड कर दिये जाते हैं तो दूसरी तरफ कुछ तथाकथित समाजसेवक का चौला पहन चुके लोग उस मृत अपराधी के पक्ष में अपनी जाती को लामबंद होने की अपील करते हैं। यह एक मात्र घटना नहीं है और पहली भी नहीं है जिसमे कोई जाती विशेष उग्र होकर आंदोलन कर रही है बल्कि इसी तरह आज से ठीक ग्यारह साल पहले भी एक जाती विशेष ने पुलिस कार्रवाही में मारे गए एक हिस्ट्रीशीटर की मौत पर बवाल खड़ा किया था।
      समाज के नाम पर, जाती के नाम पर वोट मांगने के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सपष्ट कहा है कि, कोई यदि जाती या समाज के नाम पर वोट मांगे तो उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए। लेकिन फिर भी बेधड़क हो कर जाती के नाम पर वोटों की अपील की जाती है, धड़ाबंधी की जाती है। जातीवाद कुछ इस तरह से हावी हो चुका है चुनावों पर कि लगभग हर राजनीतिक दल अघोषित रूप से जातिगत आधार पर ही टिकटों का बंटवारा करते हैं।
      आरक्षण के लिए गुर्जर और जाट आंदोलनों के विध्वंशक रूप को हम देख चुके हैं। रेल पटरी उखाड़ना, बसों को जलाना, सरकारी सम्पत्तियों को जलाना, आमजन से दुर्व्यवहार करना, महिलाओं से बदतमीजी करना, पुलिस और फौज के विरुद्ध पत्थरबाजी आदि करना इन जातिगत आंदोलनों में अब आम बात हो चुकी है। कश्मीर में बुरहान वानी के जनाजे में हजारों लोगों का इक्कठा होना, उत्तरप्रदेश के विभिन्न हिस्सों में दंगे होना, हत्याएँ होना, आसाम में दंगे होना, अब बंगाल में आग लगी हुई है। कहीं जाती के नाम पर तो कहीं धर्म के नाम पर अतिवाद का एक नया दौर चला है।  
      यह सिर्फ दंगों तक ही नहीं सिमट कर रह गया है बल्कि अब तो ये जातिवाद हमारे सभ्य समाज में कुछ इस तरह से घर कर गया है कि, सही या गलत क्या है इसकी परवाह किए बिना सिर्फ जाती के नाम पर समर्थन किया जाता है। यहाँ तक देखने में आया है कि लोग जब बीमार हो जाते हैं तो ठीक होने के लिए उसी डॉक्टर से अपनी बीमारी का इलाज कराते हैं जो अपनी जाती का होता है। प्रशासन में अपनी जाती के अधिकारी की पोस्टिंग होने पर यूं जश्न मनाए जाते हैं जैसे खुद का ही पदस्थापन हो गया हो। प्रतियोगी परीक्षाओं में और बोर्ड परीक्षाओं में पास होने वाले विद्यार्थियों के जातिगत सम्मान समारोहों की पूरी शृंखला चलती है। पिछली आईएएस परीक्षा में एक लड़की अपनी मेहनत से पास क्या हुई लोगों ने फेसबुक और व्हाट्सअप पर इतना हो-हल्ला मचाया जैसे उस लड़की ने इन सबको पूछ कर ही सिविल सर्विस के लिए फॉर्म भरा था।
      जातिवादी अतिवाद के इस दौर ने हमारे राष्ट्रीय नायकों तक को बाँट के रख दिया है। जिन स्वतन्त्रता सेनानियों ने अपने देश के लिए कुर्बानियाँ दी थी आज उनको जाती-गौरव, जाती-रत्न और ना जाने किन-किन नामों से नवाजा जाता है। लोक देवताओं तक पर अब तो जातिवादी जुमले गढ़े जा रहे हैं और इसको हवा देने का काम करते हैं कुछ स्वार्थी व्यक्ति जिनके हित छुपे होते हैं इन हथकंडों में। समाज का वर्तमान दौर जातिवादी अतिवाद का दौर है। इस अतिवाद के दौर में हर जाती अपनी विशेषता को रेखांकित करने में, सामाजिक और राजनीतिक ताकत प्रदर्शित करने में लगी हुई है। इस भयानक दौर में एक समस्या उन जातियों के सामने भी है जो संख्यात्मक दृष्टि से बहुत छोटी है। जब बहुसंख्यक जातियाँ अपने उग्र प्रदर्शन करती है, तो छोटी जातियों के लोगों में अनायास ही उन बड़ी जातियों के प्रति द्वेष पैदा होने लगा है। असल चिंता यहीं शुरू होती है कि, हमारा समाज इस जातिवादी अतिवाद के कारण जा कहाँ रहा है ? इस समस्या पर गंभीर रूप से चिंतन की आवश्यकता है कि आखिर ये जातिवादी अतिवाद हमारे समाज को किधर ले जा रहा है ? लाव हाथों से निकल जाये उससे पहले ही हमें चेतना होगा इस गंभीर समस्या के प्रति।

                                        मनोज चारण “कुमार”
                                                    लिंक रोड़, वार्ड न.-3, रतनगढ़ (चूरू)
                                       मो. 9414582964 

Thursday, June 8, 2017

धरती पर स्वर्ग है तो यहीं है, मेरी मरुभूमि भी कम नहीं है

               चिंतन की धारा किधर बह निकले इसका किसी को पता नहीं चलता। कब मन मस्तिष्क पर चुपके से भावनाएं कब्जा कर लेती है इसका भी किसी को पता नहीं रहता। भावों के उसी बहाव में ही कई बार व्यक्ति खुद को पहचान करने की कोशिश करता है। आज तक जितना भी अध्ययन किया , जिन भी विद्वानों से सुना बस एक ही बात सुनी कि, धरती पर स्वर्ग कहीं है तो कश्मीर में ही है। कहा भी है किसी ने, "अगर बर-रुए जमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।"
जन्म से लेकर आज तक का अधिकांश वक्त मैंने हमारे मरुस्थल राजस्थान में ही बिताया है। बहुत से स्थानों पर आने-जाने के बाद, अलग अलग राज्यों के अनुभव लेने के बाद आज जब पुनः अपनी इस मरुभूमि पर चिंतन करता हूँ तो मुझे लगता है कि, धरती के स्वर्ग की कल्पना करने वाले ने इस मरुभूमि के साथ अन्याय किया है। उसने इस मरुस्थल की खूबसूरती को या तो देखा नहीं है या फिर वो खूबसूरती के मायने समझने में पूर्वाग्रह से ग्रसित था। गुजरात से लेकर लगभग पूरे राजस्थान में फैले इस मरुस्थल का सौंदर्य और विशेषताएं इसे मेरी नजर में स्वर्ग बनाती है।
कहते है कश्मीर में पहाड़ है, नदियां है, झरने है, हरियाली है बर्फ है जिनका सौंदर्य बहुत देखने लायक है। एक बार कोई आकर देखे तो सही कि ऊंचे रेतीले टीले से चमकता सूरज कितना मनोरम लगता है, आकर देखे तो सही कोई कि मरुस्थल का कल्पवृक्ष खेजड़ी जब अपने पूर्ण यौवन पर होता है और जब वो मिंझर (फाल) से अपना श्रृंगार करता है तब लगता है जाने कोई नवयौवना अपने सम्पूर्ण स्वर्णाभूषणों से लकदक श्रृंगार किये खड़ी प्रियतम का इंतजार कर रही है। वही खेजड़ी जब किसान द्वारा कटाई-छंगाई कर दी जाती है और  ग्रीष्म ऋतु में बिना पत्तियों के खड़ी होती है तो लगता है जैसे कोई हठयोगी अपनी साधना कर रहा है, और जब उस साधना का प्रतिफल मिलता है तो उस पर आने वाली कच्ची-कच्ची सुनहली पत्तियों पर तो स्वयं भोलेनाथ तक लुभा जाते है फिर आम जीव-जगत की तो बिसात ही क्या।
मरुस्थल का ऐसा ही एक पौधा है फोग। जब हरे-भरे फोग की कच्ची पत्तियों को देखता हूँ तो देखते ही खुद के चौपाया न होने का अफसोस होता है। वही फोग जब अपने सफेद फूलों के साथ चांदनी रात की धीमी-धीमी हवा में लहराता है तो दिल अश-अश कर उठता है।
                 सिर्फ ठंडक से और हरियाली से ही मनुष्य का काम नहीं चलता। वक्त-जरूरत धूप और गर्मी भी चाहिए होती है। देश के पहाड़ी इलाकों में, मैदानी इलाकों में सीलन भरी रहती है, कई-कई दिनों तक जहाँ सूरज दिखता नहीं है, कपड़े सूखते नहीं है, सीलन के चलते खटमल जहां रात को सोने नहीं देते उनको देखें तो लगता है भोर के ठंडे सूरज से दोपहर के आग उगलते सूरज और फिर रात की ठंडक और हल्की सी आवाज लिए चलती हवा उसी को मिलती जो इस मरुस्थल में जन्म का सौभाग्य प्राप्त करता है।
                    मैदानी क्षेत्रों की चिकनी मिट्टी भले ही खेती के लिए बेहतर होती है लेकिन मुझे उस चिकनी मिट्टी की तासीर में लालच नजर आता है, जिसका आँचल भर गया जल से परन्तु मन नहीं भरता और वो अपने आँचल में संजोती रहती है पानी को, इक्कठा करती रहती है और फिर उसके लालच पर जल को क्रोध आता है, वह अपना संयम छोड़ कर बह निकलता है बाढ़ के रूप में। पहाड़ी मिट्टी और पत्थर उस जल के साथ ही चलने लगते हैं, अस्थिरचित्त नासमझ बालक की तरह। यहां भी मरु माटी अपने संस्कारों को दर्शाती है, उतना ही सोखती है जितने की जरूरत है, बाकी को अपना सीना भले फाड़ना पड़े लेकिन बहा देती है दूसरे की तरफ, मेरी माटी की इस विशेषता से क्या किसी ने संवाद किया कभी ? गर्मी के मौसम में ये मिट्टी खुद को तपाती है और आग उगलते सूरज की तपिश झेलती है और खुद को तैयार करती है जीव मात्र की सेवा के लिए। दो बून्द आसमान से जब इस पर गिरती है तो यह हुलस कर सामने आती है एकदम ताम्बई लाल रंग लिए और फिर करती है हरियल श्रृंगार, जिससे जीव-जगत कृतार्थ हो जाता है।
                 भले ही यहां देवदार, चीड़, बादाम और अखरोट के पेड़ न हो, भले ही यहाँ झेलम, चनाब, गंगा न हो, भले ही यहां पर त्रिवेणी संगम न हो, लेकिन जब खींप अपनी खिंपोली के साथ लहलहाती है तो मरवण गा उठती है, "खींपा छाई खींपोली जी, कोई तारां छाई रात।"
अपने लाल-पीले फूलों के साथ जब रोहिड़ा अंगड़ाई लेता है तो पहाड़ी अमलतास और पलास दोनों ही ईर्ष्या कर उठते होंगे। जब झाड़ियों पर लाल-लाल बेर लगते है तो एक बारगी हिमालयी सेव भी ललचाते जरूर हैं। कैर के झाड़ पर जब कैरिया लग कर उसे अपने बोझ से झुकाते है तो कटहल भी अपने वजन और आकार से शर्मिंदा होता होगा।
              रेतीली आंधियों की शिकायत करने वाले लोग ये भूल जाते है कि, जो रेत हमें प्रकृति बिन मोल के और बिन तोल के देती है उसी रेत से आयुर्वेदिक स्नान करने को धनी लोग न जाने कितना धन खर्च करते हैं। बर्तनों की किसी भी साबुन या पाउडर को गंभीर चुनौती देती है हमारी ये मरु-रज। पीली स्वर्ण सी चमकती बालू रेत और उसके ऊंचे टीलों पर बैठ कर सुबह के सूरज को देखना, ढलते सूरज और चढ़ते चांद को गीत सुनाने का आनन्द मुझे तो नहीं लगता किसी पहाड़ पर मिल सकता है। चढ़ते-उतरते वक्त गिरने का खतरा नहीं रेतीले टीलों पर जैसा कि पहाड़ पर होता है, अगर कोई गिर जाए तो पहाड़ जहां माफ नहीं करता जान ले लिया करता है वहीं रेतीला टीला तो गिरने के आनन्द को भी दुगुना कर देता है।
             
रात को ठंडी हवा के साथ कही दूर बोलते मोर की सुरीली आवाज का संगीत रोमांचित कर देता है और वहीं पास में ही बंधे ऊंट का गर्जन भी इसमें मृदंग सी ताल देता है, किसी भी नदी की कलकल से कम नहीं होती रात को बोलती टिटहरी की आवाज। ठीक है कि यहां झींगुर नहीं बोलते तो क्या मेंढ़क भी जब अपना सुर लगाते है तो मनमौजी संगीतकार को सरगम सुन ही जाती है। प्रदूषण रहित रात में आकाशगंगा को देखना, टूटते तारों का अपनी और आना और बीच राह में गायब हो जाना, खुले आसमान में बेफिक्र हो कर सोना स्वर्गिक आनन्द से बढ़कर है। खेतों में चौकड़ी भरते हिरणों की टोलियां और अपनी पूर्ण रफ्तार से दौड़ती नीलगाय को देख कर परमात्मा को धन्यवाद कहने को जी करता है।
सच यही है कि, मरुस्थल के इस निराले सौंदर्य पर मन रीझ-रीझ जाता है। हालांकि सबको अपनी जन्मभूमि अच्छी लगती है, परन्तु ईमानदारी से सच स्वीकार किया जाय तो राजस्थान के मरुस्थल जैसा मरुस्थल कहीं अन्यत्र दुर्लभ है। प्रकृति ने इसे जैविक समृद्धता के साथ सौंदर्य भी भरपूर दिया है। मैं मेरी मातृभूमि के इसी सौंदर्य पर रीझता हूँ और बिना संकोच कहता हूँ कि, "अगर जमीं पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, मेरी मरुभूमि किसी स्वर्ग से कम नहीं है।"

- मनोज चारण "कुमार" कृत

Tuesday, May 23, 2017



मौत से था जिनका याराना : क्रांतिवीर कुँवर प्रतापसिंह बारठ

    इतिहास में नाम लिखाने का मौका बार-बार नहीं मिला करता। हर कोई इतिहास में नाम लिखाना चाहता है, किन्तु लिखा नहीं पाता। खुद को मिले मौके को भुनाना ही महान व्यक्तित्व की निसानी होता है। कोई जन्म से ही महान नहीं होता, बल्कि महान बनाते है व्यक्ति के कर्म। व्यक्ति के कर्म उसके परिवार, मित्र, विद्यालय और आस-पास के माहौल से ही निर्धारित होते हैं। कुँवर प्रतापसिंह बारठ भारतीय इतिहास गगन-पटल पर चमकने वाला एक ऐसा ही उज्ज्वल नक्षत्र है, जिसने अपने कर्म से न सिर्फ अपने परिवार को, न सिर्फ अपने समाज और जाति को, न केवल राजस्थान को बल्कि पूरे भारत-वर्ष को गौरवान्वित किया था।
    प्रतापसिंहजी का जन्म पिता क्रांतिकारी बारठ केशरीसिंहजी के घर माता माणक कुँवर की उज्ज्वल कोख से हुआ था। 24 मई 1893 ई. को उदयपुर में कुँवर प्रतापसिंह का जन्म हुआ था। अल्पायु में पिताश्री ने बालक प्रताप को महान क्रांतिकारी अर्जुनलाल सेठी की गोद में सौंप दिया था और सेठी साब ने प्रताप को और उनके बहनोई को मास्टर अमीरचंद के पास भेज दिया। अमीरचंद ने रासबिहारी बोस से मिलकर प्रताप और उनके साथियों को रेव्योलूसनरी पार्टी में भर्ती करवा दिया। बोस के निर्देशन में बालक प्रताप एक युवा क्रांतिकारी में बदल गया था। रासबिहारी बोस ने अपने एक पत्र में लिखा है, प्रताप को देखा था तो मालूम हुआ कि उसकी आँखों से आग निकल रही है। प्रतापसिंह प्रकृति से ही सिंह था।
    प्रतापसिंह ने भारत सरकार के तात्कालिक गृह सचिव सर रेजिनल्ड क्रेडक को मौत के घाट उतारने का जिम्मा लिया था, परंतु क्रेडक बीमार पड़ गया और इस वजह से उसका बाहर आना-जाना बंद हो गया तो उस पर हमला नहीं हो सका था।    
    1912 में पूरे भारत को अपने जल्लो-जलाल के रूतबे के नीचे लाने के लिए दिल्ली में एक विशाल जुलूस निकाला जाना था, जिसमें वायसराय लॉर्ड हार्डिंग्ज द्वितीय भी शामिल होना था। रासबिहारी बोस ने इस जुलूस पर हमला करने की रणनीति बनाई और इसका जिम्मा दिया जोरावरसिंहजी बारठ और उनके भतीजे कुँवर प्रतापसिंह को। प्रतापसिंह ने काफी दिनों तक पत्थर फेंक कर इसका अभ्यास भी किया था, परंतु कद में छोटे होने के कारण बाद में ये बम फेंकने का जिम्मा जोरावरसिंहजी को दिया गया। चांदनी चौक से निकल रहे विशाल जुलूस पर जोरावरसिंहजी ने बम फेंक कर धमाका कर दिया था और उसके बाद दोनों चाचा-भतीजा वहाँ से फरार हो गए। इस धमाके में हार्डिंग्ज और उसकी पत्नी बुरी तरह से घायल हो गये और उसका छत्र उठाने वाला बलरामपुर का जमींदार महावीरसिंह उसी वक्त मौत के मुंह समा गया। हार्डिंग्ज के जिंदा बचने पर आदरणीय गांधीजी ने उसके जिंदा बचने की खुशी में उसकी सलामती का तार भी भेजा था। इस बात पर सवाल ये उठता है कि, क्या ये हमारे राष्ट्रपिता का हमारे क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान का भाव था ?
    कुँवर प्रताप और उनके चाचा जोरावरसिंह वहाँ से तो फरार हो गये लेकिन दिल्ली से बाहर जाने वाले हर रास्ते को पुलिस ने घेर रखा था, ऐसे में चाचा-भतीजा दोनों, रात भर दिल्ली के यमुना पुल के नीचे लगी जंजीरों को पकड़ कर लटके रहे और नीचे बाढ़ से उफनती यमुना का ठंडा पानी उनकी कमर तक को ठंडा कर रहा था। अल सुबह दोनों ही क्रांतिकारी वहाँ से फरार हुए लेकिन नदी किनारे पुलिस के दो जवानों ने इन्हें रोक लिया। जोरावरसिंहजी ने उन दोनों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया। जोरावरसिंहजी तो वहाँ से राजस्थान पहुँच गए लेकिन प्रताप बीच में ही रुक गए थे।
    प्रतापसिंहजी को बम बनाने के अपराध में बनारस षडयंत्र केस रचकर गिरफ्तार कर लिया गया था और इसी केस में उन्हें फरवरी 1916 में मात्र बाईस वर्ष की उम्र में पाँच वर्ष की जेल की सजा सुना दी गई और उन्हें बरेली केन्द्रीय जेल भेज दिया गया। बरेली जेल में प्रताप को अमानवीय यातनाएं दी गई और क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया गया। जब इस यातना से प्रताप नहीं डिगे तो उन्हे प्रलोभन दिया गया कि उनके पिता जो कि उस वक्त हजारीबाग जेल में थे उनको छोड़ दिया जाएगा, लेकिन प्रताप इस पर सहमत नहीं हुए। उन्हें ये भी प्रलोभन दिया गया कि, वो यदि अपने साथियों के नाम बता देते हैं तो उनकी जब्त जागीर लौटा दी जाएगी और उनके चाचा के नाम जारी गिरफ्तारी वारंट भी वापिस ले लिया जाएगा, लेकिन जो बात से डिग जाए वो चारण नहीं होता, प्रताप भी नहीं डिगे। अंग्रेजों ने अंतिम हथियार के रूप में प्रताप को भावुकता में बहाने की कोशिश की और कहा कि, तुम्हारी माँ की हालत देखो और उसके आंसुओं को देखो, यदि तुम अपने साथियों के नाम बता देते हो तो तुम्हारी माँ को रोना नहीं पड़ेगा। परंतु प्रताप ने तो जैसे मौत से दोस्ती कर ली थी। अपनी इसी दोस्ती को निभाया प्रताप ने और इतिहास रचने वाला कारनामा करते हुए इस भावुकता भरे अत्याचारी प्रलोभन का जबाब अपनी कठोर वाणी से दिया, मेरी माँ को रोने दो जिससे सैंकड़ों को न रोना पड़े। यदि मैने दल का भेद खोल दिया तो यह मेरी वास्तविक मृत्यु होगी और मेरी माता का अमिट कलंक होगा
    इस तरह की बात इतिहास में सिर्फ भगतसिंह ने ही कही थी, लेकिन प्रताप इस मामले में भगतसिंह के अग्रगामी थे। बरेली जेल के रजिस्टर में लिखे गए पृष्ठ संख्या 106/107 के अनुसार 24 मई, 1918 को मात्र पच्चीस वर्ष की अल्पायु में ही अंग्रेजों की क्रूर यातनाओं को झेलते उस नौजवान की जवानी थक गई और चारण कुल गौरव प्रताप चिर-निद्रा में सो गए।  
    बरेली जेल में प्रतापसिंहजी से पूछ-ताछ करने वाले अंग्रेज़ अफसर आर्चीबाल्ड क्लीवलैंड ने उनसे पूछ-ताछ करने के बाद अपनी टिप्पणी में लिखा था, मैंने आज तक प्रतापसिंह जैसा वीर और बिलक्षण बुद्धि वाला युवक नहीं देखा। उसे सताने में हमने कोई कसर नहीं रखी पर वह टस से मस नहीं हुआ। हम सब हार गए वह विजयी हुआ। किसी अंग्रेज़ अधिकारी का यूं स्वीकार कर लेना कि, वो हार गए थे उस क्रांतिकारी के लिए सही माने में जीत थी।
        प्रताप का महत्व सिर्फ इस लिए ही नहीं है कि वो अल्पायु में ही शहीद हो गए थे, बल्कि इसलिए भी है कि, वो उस परिवार से नाता रखते हैं जिस परिवार ने अपना पूरा खानदान क्रांति की राह में झौंक दिया था। पिता केशरीसिंह बारठ, चाचा जोरावरसिंह बारठ, जीजा ईश्वरदानजी आशिया और स्वयं प्रताप। इस देश के इतिहास में ऐसे सिर्फ दो परिवार हुए है जिन्होने अपने पूरे खानदान को राष्ट्रहित पर बलिदान किया हो। एक तो दसमेश गुरु श्री गोविंदसिंहजी महाराज का परिवार और दूसरा राजस्थान का ये बारठ परिवार।
    महान स्वतंत्रता सेनानी शचीन्द्र सान्याल ने बारठ परिवार और प्रतापसिंह के बारे में अपने संस्मरण में लिखा है, यह परिवार राजपूताना के गणमान्य समृद्ध जमींदारों में गिना जाता था, किंतु स्वदेश प्रीति और तेजस्विता की खातिर इन्हें अपना घर-बार बर्बाद करना पड़ा।..............प्रताप वैसे कर्तव्य की खातिर ही उस कार्य में योग नहीं देते थे। उन जैसे युवक मैंने बहुत ही कम देखें हैं। प्रताप केवल स्वयं ही आनंद में रहतें हों ऐसा नहीं, उनके संग में जो रहते थे वे भी आनंद पाते थे।......... मन में एक बार नीचे फिसल पड़ने पर उसे फिर अपनी जगह लौटा लाना कितना कठिन कार्य है, यह चिंताशील व्यक्ति ही समझ सकते हैं।
    सम्पूर्ण राजस्थान को इस महान सपूत पर नाज होना चाहिए और इस जैसे पुत्र को प्राप्त करने वाला समाज तो निःसंदेह महानता और गौरव का अनुभव करता है। उनकी एक सौ चौबीसवीं जयंती के शुभ और ऐतिहासिक अवसर पर ऐसे मेरे अग्रज और पूर्वज भ्राता के श्री चरणों में मैं बार-बार वंदन करता हूँ।
   
मनोज चारण (गाडण) कुमार
लिंक रोड़, वार्ड न.-3, रतनगढ़ (चूरु)

मो. 9414582964   

Tuesday, December 6, 2016


कल एक विशेष दिवस था और इस विशेष दिवस पर मुझे अपने हिन्दुत्व पर गर्व हुआ और मैंने खुद से पूछा कि मैं हिन्दू कैसे हूँ ?

जो जबाब मिला उसे एक कविता के रूप में आप सबके सामने पेश है।

शेष फिर कभी ........................।


मनोज चारण "कुमार"

Wednesday, April 20, 2016

नमस्कार सभी को !

इस देश में हो क्या रहा है ? कोई धणी-धोरी नहीं है देश का। सब सत्ता के मद में और सत्ता सुंदरी के लिए यूं परेशान हैं कि जाने बिना सत्ता के इस दुनिया में कुछ नहीं है। सही भी है सत्ता के बिना है भी क्या ? पर कल तक जो चाल-चरित्र-चेहरा की राजनीति करते थे आज उन्हे अचानक से उन लोगों से कोई मतलब नहीं रहा जिन्होने इनके आज के लिया अपना कल बर्बाद कर दिया था। कल तक जो नारे लगाते थे कि, "जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है।" 
आज अचानक से कश्मीर में ऐसा क्या हो गया कि भारत सरकार को कि पुलवामा में सेना के बंकर हटाने को राजी हो गयी। बात ये नहीं है कि इससे क्या फर्क पड़ेगा, बात  ये है कि आखिर इस कदम से सेना के हौसले पर क्या फर्क पड़ेगा ? वो सेना जो इस देश में हनुमान से कम नहीं है, चाहे भूकंप हो, चाहे बाढ़, चाहे किसी बच्चे का बोरवेल में फंसना या फिर कहीं किसी समुदाय का आरक्षण आंदोलन हो। सेना ही इस देश में संकटमोचक बन कर आती है सामने। मुझे अखबारों के वो चित्र और लेख और समाचार अच्छी तरह से याद है कि, किस तरह से सेना ने लातूर और भुज के भूकंपो से छै माह के बच्चों को सेना ने जिंदा निकाला था, किस तरह से सुनामी से सेना लड़ी थी, किस तरह से उत्तराखंड से लोगों को निकाला था, किस तरह से हरियाणा को बचाया था। 
जब हमारी सेना जो कि दुनिया की शायद एक मात्र सेना होगी जो कि सामाजिक और प्राकृतिक आपदाओं में देश को बचाती है। ये सेना सिर्फ युद्ध ही नहीं करती बल्कि अपने मनुष्य होने का भी एहसास कराती है। कश्मीर में सेना के द्वारा मारे गए आतंकवादी सबको दिखाई देते है, पर बर्फ में दब कर कितने हनुम्त्थपा शहीद होते है वो किसी को भी दिखाई नहीं देते। अभी जो सेना पर पिछले दिनों आरोप लगाया गया है वो निहायत ही शर्मनाक है, जब वो बच्ची कह रही है कि उसके साथ घटना को अंजाम देने वाले सैनिक नहीं बल्कि वहाँ के स्थानीय गुंडे थे, तो फिर इस पर राजनीति की कहाँ जरूरत है। राजनीति करने वाले लोग तो कल तक इशरत जहां को भी निर्दोष बता रहे थे जबकि ये प्रमाणित हो चुका है कि, वो एक आतंकवादी थी। कहने का मतलब ये है कि इस देश को सबसे बड़ा खतरा चीन या पाकिस्तान से नहीं बल्कि हमारे ही राजनेताओं से है, उन राजनेताओं से जो सिर्फ विरोध और स्वार्थ की राजनीति करते हैं। 
कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाए रखने के प्रयास में शहीद हो चुके सैनिको, इस कश्मीर के लिए जिन सुहागनों ने अपना सुहाग लुटाया है उन भारतीय वीरांगनाओं, जिन माँओं ने अपने लालों को सीमा पर सिर्फ इसलिए बलिदान होने के लिए भेज दिया कि, "तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें ना रहें।" उन माँओं के दूध के लिए मैं भारत सरकार के इस बंकर हटाने वाले फैसले का विरोध करता हूँ। 
माफ करेंगे मुझे इस देश के कर्णधार कि मैं कड़वी बात कह रहा हूँ पर सच ये है कि पहले अपने बेटों को सेना में भेजो और फिर ये कदम उठाओ तो जाने कि किसके गुर्दे ज्यादा मजबूत है देश की जनता के या कि नेताओं के। 

शेष फिर कभी ...................................................। 

मनोज चारण (गाडण) "कुमार"
मो. 9414582964  

Tuesday, March 29, 2016



हिन्दी में दोहे लेखन का प्रयास किया है। पेश करता हूँ ..............................



शेष फिर कभी .............।

 मनोज चारण

Sunday, March 20, 2016


नमस्कार !

    कल 23 मार्च है, इस देश के महान सपूतों भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहीदी दिवस। मन में अजब सी उदासी है, अजब सी खलिस है, कि क्यों वो लोग चढ़ गए थे फांसी पर इस देश के लिए। यदि हम गौर करेंगे तो हमे पता चलेगा कि, इस देश के लिए जान देने वाले अधिकांश क्रांतिकारी बीस से सत्ताईस वर्ष कि आयुवर्ग के थे। भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक़उल्ला, प्रतापसिंघ, खुदीराम बोस ये सब तो पच्चीस वर्ष के भी नहीं हुए थे, यानी कि ये लोग तो भारतीय आश्रम व्यवस्था के अनुसार तो अपने ब्रह्मचर्य कि उम्र तक भी पार न कर सके थे, ऐसे में इनको सोच कैसे बन पायी होगी क्रांति की राह पर चलने की, कैसे इन लोगों ने समझाया होगा अपने-आप को कि, जबकी उनकी उम्र किसी के काले केशों में उलझने की थी उस उम्र में वो अदालतों के केशो में उलझ गए। जब उनकी उम्र थी दुनिया कि रंगीनीयों में खोने की उस वक्त वे काल-कोठरियों के अंधेरों से टकरा रहे थे। क्या था उनके मन में, क्या थी उनकी जिजीविषा?
       समझ में नहीं आता ना, कैसे आएगा समझ में जब तक हम अपने-आप को उस स्थान पर नहीं रखेंगे, कैसे समझ में आएगा जब तक कि हम खुद से ही सवाल नहीं करेंगे कि, हमने इस देश में जन्म क्यूँ लिया है? नहीं समझ में आएगा तब तक जब तक हम यही सोचेंगे कि, कोई भऊँ नृप, हमऊँ का हानि।
    हमे समझना पड़ेगा कि, आज के दौर के तथाकथित क्रांतिकारी जो अपने आपको भगतसिंह का उत्तराधिकारी मानते है और कहते हैं, वो भगतसिंह के चरणों की मिट्टी की हौड़ नहीं कर सकते।
    एक अजीम-ओ-शान क्रांतिकारी समूह के श्रीचरणों में मैं वंदन करता हूँ, और अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ कि, हे महानायकों मैं इसलिए आजाद भारत में सांस ले पा रहा हूँ कि, आपने इसके लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिये थे। मैं शुक्रिया अदा करता हूँ आप सब शहीदों का, और अपने दौर के देश-विरोधी बाते करने वालों की करतूतों पर मैं शर्मिन्दा भी हूँ।
             शेष फिर कभी ...........................। 

मनोज चारण (गाडण) कुमार
रतनगढ़ (चूरु) राज.
मो. 9414582964