Thursday, April 23, 2015

सादर जै श्री अम्बे ! 

           मेरा देश जो कभी कृषि प्रधान देश कहलाता था, मेरा देश जो जतियों और सतियों का देश कहलाता था, मेरा देश जहां पर किसान हल जोतता था तो सीता जन्म लेती थी, मेरा देश जिसमे भगवान भी गोपाल बन कर पैदा हुए, मेरा देश जिसने किसान के बेटों को देश के सर्वोच्च पदों पर बैठाया, मेरे उस देश के एक मजबूर बेटियों के बाप को, मजबूर माँ के बेटे को, मजबूर गृहणी के मजबूर पति को और मजबूर देश के मजबूर किसान को जब देश की राजधानी में संसद के ठीक पास में आत्महत्या के लिए फांसी खानी पड़े तो आँखों में आँसू नहीं आते बल्कि अंगारे बरसने लगते है। इस घटना पर कोई भी कुछ नहीं बोले, सब अपनी-अपनी ढपली पर अपनी राग आलाप रहे है ऐसे में ना तो मुझे नायिका के केश सुहाते है और ना ही कोई हास्य रस की फूहार ही अच्छी लगती है। इस देश की नपुंसक सरकार के खिलाफ सिर्फ आक्रोश ही आक्रोश छलक़ता है। राजस्थान के एक किसान ने देश को आईना दिखा दिया है, उस दिलेर ने अपने गाँव-ढाणी में अपनी इहलीला खतम नहीं की बल्कि छाती पीट-पीट कर अपने को किसान हितैषी बताने वालों के गढ़ ने जाकर राजस्थानी जौहर, तागा, केसरिया की परंपरा का निर्वहन किया है, मैं नमन करता हूँ उस हुतात्मा को जिसने इन नीचों को नंगा किया है। उस वीर की शहादत पर मेरी चंद पंक्तियां समर्पित करता हूं -  

देश का जनाज़ा है ये कैसा है तमाशा जाने,
देश का किसान आत्महत्या पे उतारू है।
कैसी है समस्या जाने अन्नदाता परेशान,
देश की सरकार भी अब हो गई  बीमारू है।
खो गये है गांधी बाबा, खो गए है शास्त्री भी,
खो गए पटेल सरीखे किसान रखवारु है।
अब तो बचा है देश में केवल बाजार देखो,
और बचे है वो सारे नेता जो बाजारू है।१। 
राजधानी मौन है और जनता में है खौफ भारी,
देश की जनता ने देखो उंगली उठाई है।
देश की गद्दी पर बैठे सारे भांड एक जैसे,
सारे के ही सारे खाते रबड़ी मलाई है।
नेताओ के साथ देखो मिल गया आसमां भी,
जिसने बारिस के संग कहर बरसाई है।
अब तो सुनो तुम कान्ह कन्हाई मेरे,
नहीं जो सुनोगे तो ये तेरी जग हँसाई है।२।  
हत्या के दोषी है सारे देश की जो सरकारे,
देश के किसान की ना कोई सुनवाई है।
कोई पैर पकड़ाता, कोई करता है बाते,
किसी के भी देखो मन दया नहीं आई है।
सब करते है देखो झूठी ये लफ्फाजी अब,
किसी की भी आँख जरा सरम न हयाई है।
लूट-लूट खा गए जो देश को वो जाने कैसे,
कर रहे है देखो इस देश की रहनुमाई है।३।
अब तो संभल जाओ छप्पन इंची छाती वालों,
आने लगी अब सबके सामने सच्चाई है।
बंद करो प्रलाप और झूठी बाते सारी,
मान जाओ गलती इसी में ही भलाई है।
कर रहे आत्महत्या देश में किसान देखो,
जग मे ये तूने कैसी छवि अब बनाई है।
छप्पन इंची छाती वालों देश की गद्दी को छोड़ो,
देश की जनता में अब यही मांग छाई है।४।

- मनोज चारण (गाडण) ''कुमार'' कृत  

Sunday, March 22, 2015

माँ की स्तुति

राग रंग कछु नहीं जाणू, जाणू कोणी छन्द। 

बिना बन्द रा छन्द माँ, अरपण है जगदम्ब।। 

प्रथम ईश नै ध्यायके मैं ध्याऊँ गजानन्द। 

करणी माँ  हिरदै मै बसो,शारद बगसो छन्द।।


थारी मूरत बड़ी है सोवणी, माँ सूरत रूप अनूप।           

थारै हाजर सब खडया माँ, सुर-असुर-नर-भूप।।          

माँ थासूं सूरज च्यानणो, अर चंदा रूप उजास है।             

माँ थारै मढ़ री जोत है, अर काबा आसू-पास है।।          

माँ ओरण है मनभावणी, अर छटा घणी सरसावणी।।  

हो देशनोक री आप धिराणी, माँ कीरत गाउँ चारणी।। 

कर जोडया कथना करूँ, माँ कीरत गाउँ आपरी।         

चरण  शरण  दे  चारणी,  अर लाज राखजे खाँप री।।


चारण चरणा शरण पड़यो, माँ बेगी आय उबार।           

सिंघ  चढ़ी  झट  आवजे, माँ हेलो करै कुमार।।


मनोज चारण “कुमार”


Wednesday, October 15, 2014

दीवारें


          अक्सर दीवारें दो लोगों के बीच में आ जाया करती है। आखिर क्यों बनती है ये दीवारें ? कौन बनाता है इन्हें ? समझ में नहीं आता किसे दोष दूँ।
         समाज को, परम्परा को, आज के वातावरण को या खुद इंसान को ? परम्पराएँ दोषी कैसे हो सकती है, क्योंकि परम्पराएँ डालता कौन है ? समाज किससे बनता है और वातावरण बनाता कौन है ? आज से नहीं वर्षों और सदियों से ही नहीं अगर कहें तो वास्तव में मानव का जन्म हुआ है तब से ही मनुष्य स्वयं ही तो यह सब बनाता आया है।
         कभी वातावरण का निर्माण तो कभी समाज का, कभी परम्परा का तो कभी मूल्यों का। इन सबने मिलकर खड़ी की है ये दीवारें।
         दीवार आखिर है क्या ? इसे तो कोई भी फांद सकता है। क्या वह कुछ बोलकर कहेगी ? शायद नहीं ! क्योंकि दीवारें बोलती नहीं, पत्थर बोला नहीं करते। लेकिन पत्थरों से बनने वाले गवाक्ष बोलते है, अक्सर बोला करते है। इन गवाक्षों से झांक कर ही तो अक्सर लोग परम्पराओं की दुहाई दिया करते है। किन्तु, वे स्वयं नहीं जानते कि वो इस गवाक्ष में छुप कर क्या एक नयी परम्परा को जन्म नहीं दे रहे है। आखिर कब तक यूं ही परम्पराओं के नाम पर लोगों को मिलने से, जानने से और पहचानने से रोका जाता रहेगा।
        कहीं से, कभी तो शुरुआत करनी होगी। जब शुरुआत करनी ही है तो फिर हमसे ही क्यों नहीं ? हम ही क्यों न मिलें ये गवाक्ष पीछे छोड़ कर, दीवारें तोड़ कर। एक उन्मुक्त वातावरण में, के खुले आसमान तले, एक दीवार रहित धरा पर। क्यों नहीं सिलसिला हम ही शुरू करें..............दीवारों को तोड़ने का।

                                       मनोज चारण
                                     मो. 9414582964 

Thursday, December 19, 2013

क्या भारत अपने 2500 साल पुराने लोकतन्त्र की तरफ बढ़ रहा है...........?

नमस्कार !

                आज कुछ बाते भारत के लोकतंत्र के बारे में कर लेते है, बात इतिहास से शुरू करते है, इतिहास मे हमे कुछ उदाहरण मिलते है की चन्द्रगुप्त मोर्य, चन्द्रगुप्त द्वितीय, हर्षवर्धन, अकबर, महाराजा रणजीतसिंह, महाराजा गंगासिंह आदि को जब-जब कुछ विशेष बात पता करनी होती थी, तो वो फिर जनता के बीच भेष बदल कर जाते थे, वहाँ पर उनको अपनी समस्या के बारे मे या राज-काज कैसे सुधरे इसके बारे मे समाधान मिलता था, और वो उसी के अनुरूप अपना फैसला लेते थे। ये सभी राजा अपने समय के ही नहीं बल्कि हर समय के लिए नजीर बन चुके है। भले ही इनका राज्य कितना ही छोटा रहा हो या बड़ा रहा हो। 
              भारत कि आजादी के समय  हमारे भारत का संविधान जब बना तो वो एक तरह से जनमत संग्रह की ही उपज था, इसी प्रकार विश्व मे अनेक बार जनमत संग्रह होते आए है। दिल्ली के निर्भया-दामिनी केश मे यही तो हुआ था, या फिर चाहे जेसिका लाल हत्याकांड मे हुआ हो।
               भारत में पंचायती राज को काफी महत्व दिया जाता है, गांधीजी ने तो पंचायती राज को ही असली सुराज कहा था।  पंचायती राज मे भी ग्रामसभा की अवधारणा है जो यह तय करती है कि, ग्राम कि हर समस्या को सुलझाने मे हर ग्रामवासी का योगदान होना चाहिए, और फिर ये सब आखिरी तो जनता का लोकतन्त्र मी भागीदारी का ही तो प्रमाण है।
               यदि ये सब सही है तो फिर आम आदमी पार्टी द्वारा अपने सरकार बनाने या ना बनाने के फैसले पर एक बार फिर जनता कि सलाह ली जाती है तो किसी के भी पेट मे दर्द क्यों होता है ? क्या इस देश मे फैसला लेने का हक किसी साहजादे, साहबजादे, महारानी, महाराजा को ही है। ये तो वही नजीर हो गई, "ना खाता ना बही, जो केशरी कहे वो सही।"
                किसी पार्टी को निर्देश कहीं से मिलते है, किसी को कहीं से। कोई तो अपने नेता को देश के 120 करोड़ जनता का प्रतिनिधि बताते है, कोई अपने को, और सच ये है कि जब चुनाव के बाद वोट के प्रतिशत की  भागीदारी देखे तो पता चलता है कि देश कि सरकार मात्र 30 प्रतिशत वोट वाले लोग चला रहे है, ये लोकतन्त्र कि सीमा है, कमी है। इसे स्वीकार करना चाहिए, इसमे सुधार करना चाहिए।
                मुझे आइडिया कंपनी का वो विज्ञापन याद आता है जिसमे एक विधायक नेत्री अपनी जनता से एसएमएस कर पूछती है कि पुल बनना चाहिए या नहीं। जनता जबाब देती है और पुल बन जाता है।  यदि वही प्रक्रिया आम आदमी पार्टी भी अपनाती है तो फिर गलत कहाँ है ?
                क्या ये लोकतन्त्र मे फिर से वही अवधारणा तो नहीं बन रही जो कभी वैशाली गणतन्त्र में हुआ करती थी, या वज्जी संघ मे हुआ करती थी। जब हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र कि दुहाई देते है तो फिर हमे दुनिया के सबसे पुराने लोकतन्त्र कि अवधारणा को भी जीना चाहिए, जो हमारी उन्नत स्थिति थी। हम क्यों नहीं दुनिया के सामने एक और नजीर रख सकते कि भैया देखो ये भी होता है, इस देश में। सच मे गांधी के स्वराज कि तरफ केजरीवाल का ये कदम स्वागत के योग्य है।
                कारगिल युद्ध परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टेन मनोज पांडे ने अपनी डायरी में लिखा था कि, "किसी लक्ष्य को प्राप्त करना तो महान होता ही है, पर किसी महान लक्ष्य कि प्राप्ति मे असफल होना कोई बुरी बात नहीं, क्योंकि महान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उठाया गया कदम ही काफी महान होता है।"
                  तो केजरीवाल के इस कदम का स्वागत होना चाहिए, जिसने पिछले 2 साल में राजनीति कि 60 सालों से जंग खा चुकी परम्पराओ पर रेजमाल तो घिसा है, कम-से-कम किसी ने हिम्मत तो की, जो इन सड़ती परम्पराओ को धूप मे रखने की कोशिस तो की है।
क्या ये सही नहीं है........................... ?
यदि नहीं तो क्यों नहीं ......................?
यदि हाँ तो फिर क्यों नहीं मिले इसे समर्थन ..............................?
 
सादर नमस्कार !
 
मनोज चारण। 

Friday, December 6, 2013

क्या सोचता है युवा … 

नमस्कार ! 

            कल मैंने देखा कि जिस युवा की बात लोग  करते रहते है वो क्या वास्तव में ही कुछ कर सकता है समाज के लिए या फिर लोग यूँ ही चिल्लाते है।  मैंने उस युवा को कल देखने के बाद इस पर विचार किया कि सच में युवा हमें जैसा दीखता है वैसा है नहीं। 
             दिखने का तो क्या है सूरज भी ग्रहण के वक्त काला दिखता है, पर सच में होता नहीं है, यही बात युवा पर भी लागु होती है। युवा हमें अपाचे बाइक पर बैठा, सिगरेट का धुँवा उड़ाता, काला चश्मा लगाये, कानो में इयर फोन लगाये, नाइके की टोपी लगाये और दीन-दुनिया से बेखबर दिखता है। 
              पर कल मैंने देखा के अलमस्त सा लगने वाला ये युवा मन ही मन डरा हुआ है, न सिर्फ आज से बल्कि इस समाज से, कल सामने आने वाली बेरोजगारी कि समस्या से भी।  इसीलिए वो झुक जाता है जब देखता है किसी मंदिर को, किसी मस्जिद को भी।  अपाचे चलाने वाला युवा उतरता है, गोगल को पीठ पीछे सलमान कि तरह डालता है, चप्पल खोलता है और गोगाजी कि मेड़ी पर बड़ी शिद्दत से नमन करता है। 
              मुझे लगता है कि ये वो युवा है जिसके मन में सपनीला, चमकीला रजतवर्णी संसार तो है पर कहीं पर मन कि गहराइयों में भारतीय संस्कार भी दबे है, छुपे है।  यदि इस युवा पर भारत गर्व करता है तो सही है।  
        पर हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि कहीं ये किसी डर से तो नहीं झुक रहा है, यदि ऐसा है तो फिर समाज को सोचना चाहिए, युवा के मन में सकारात्मकता होनी चाहिए डर नहीं। हमें इसे गहराई से समझना पड़ेगा। 

                                                जय श्रीअम्बे !


                                                                 मनोज चारण 

Friday, January 4, 2013

Krantikari Kesri Singh Barth


क्रान्तिकारी केशरीसिंह बारठ 

                 सादर जय श्री अम्बे  ! 

                                        
क्रांति शब्द को सुनते ही ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने कानो में गरम-गरम  अंगारे डालें हैं , जैसे शांत वातावरण में अचानक आंधी  गई है, या जैसे किसी ने शांत मंदिर में तेज घंटा बजा दिया है और नाद से पूरा मंदिर गूँज उठा हो। वास्तव में क्रांति शब्द में बेहद आकर्षण है, जो खींचता है अपनी  ओर लेकिन यह खिंचाव तो ठीक वैसा ही है जैसे मशाल पर पतंगे का, जैसे शमा पर परवाने का, जैसे बीन पर मणिधर का। देखने में और सुनने में तो क्रांति शब्द काफी रोचक तथा रोमांच भरा लगता है लेकिन वास्तव में यह काँटों भरी राह ही नहीं अपितु रक्त और दर्द भरी राह भी है। ऐसी राह को चुनना ना सिर्फ दिलेरी और बहादुरी का काम है वरन अपार जोखिम और पीड़ा का भी है।  
                            वास्तव में क्रांति शब्द पर खिंचने वाले क्या यह जानते भी है कि, इसका वास्तविक अर्थ क्या है ? शब्दकोष में तो जाने क्रांति का क्या अर्थ लिखा होगा ? परन्तु हमारे हिसाब से जब कोई कार्य एक साथ प्रबलता के साथ किया जाये तो वह शायद क्रांति होती है। क्रांति को शाब्दिक अर्थ से दूर खोजने पर ऐसा लगता है कि, पुरातन परम्पराओं के विरुद्ध आवाज उठाने कोपरम्पराओं के खिलाफ चलकर कदम उठाने कोपरम्पराओं  की वर्जनाओं को तोडना क्रांति कहलाता है। आप किसी भी प्राचीन परम्परा को, एक ढर्रे को, एक बंधी-बंधाई लीक को यदि बदलने की, तोड़ने की या उस लीक को छोटी करने का प्रयास करते है, तो यह क्रांति कहलाती है। क्योंकि, परम्परा के विरुद्ध सोचना, चलना और उसे चुनोती देना किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं होती है  किसी समय में यही काम आर्कमिडीज ने किया, अरस्तु और प्लेटो ने किया होगा, शायद यही काम ईशा और  मोहम्मद ने भी किया होगा तभी तो किसी को क्रूस पर चढ़ना पड़ा और किसी को जहर का प्याला पीना पड़ा। क्या कवी गंग का मस्तक यूँ ही कट गया था ? क्या आजाद को सीने में खुद की ही गोलियां खाने का शौक  चर्राया था या फिर वह कोई पतंगे और मशाल वाली कहानी थी। क्या भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी  हमे नहीं बताती कि वास्तव में क्रांति क्या है और उसका अंजाम भी 
                                             वास्तव में क्रांति की राह पर ही चले थे ये सभी, किसी ने परम्परा के विरुद्ध सोचने की कोशिस की तो किसी ने सामाजिक रुढियों को तोड़ने की, किसी ने धर्म की वर्जनाओ को तोडा तो किसी ने परिवार और खानदान की। किसी ने शासन को आँख दिखने का काम किया तो किसी ने बागी बनकर बन्दूक उठा ली। वास्तव में क्रांति का क्षेत्र छोटा नहीं होता है और जिस विस्तृत परिदृश्य पर यह लागु होता है उस पर कभी बहस नहीं होती 
                                                       ठाकुर केसरीसिंह बारठ ऐसे ही एक क्रांतिकारी का नाम है, जिसे वास्तव में इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जो उसे मिलना था। बारठ कृष्णसिंह के घर पर ज्येष्ठ पुत्र के रूप में माँ बख्तावर बाई की कोख से  21 नवम्बर, 1872 . विक्रम संवत 1929 को केसरीसिंह जी ने जन्म लिया और आपकी एक माह की बाल्यावस्था में ही आपकी माताश्री का निधन हो गया। ऐसे में केसरीसिंह जी का पालन पोषण उनकी दादी श्रृंगारीबाई ने किया था। आपकी दादी ने आपको बचपन में जो कहानियां सुनाई  थी वे कोई चंदामामा या राजकुमारी की नहीं बल्कि प्रताप, सांगा, शिवाजी जैसे महापुरुषों की थी, जिन्होंने फाखे रखकर भी आजादी को बरक़रार रखा था। ऐसे प्रभावशाली बचपन का पौधा तो विशाल बरगद बनना ही था। हम केसरीसिंह जी के पारिवारिक जीवन पर अधिक विस्तार से चर्चा  करके उन्होंने जो कार्य किया उस पर अधिक चर्चा करें तो ज्यादा अच्छा  रहेगा।  
                                महाराणा प्रताप का गौरव आज यदि  धरती पर और भारतवर्ष के जनमानस पर अमिट है तो उसका कारण थे कवी पृथ्वीराज राठोड़ जिन्होंने बेहद खरी-खरी बातें कह कर राणा के सोये स्वाभिमान को जगाया था, वरना तो राणा ने तो जलाले अकबरी के सामने समर्पण का मन बना ही लिया था, पत्र लिख दिया था। एक क्षण के लिए सोचिए कि, यदि महाराणा प्रताप भी अकबर के दरबार में मानसिंह के साथ खड़े जुहार करते तो क्या राणा की वो छवि बन पाती जो आज है ?
               कालांतर में वही और उससे भी बढ़कर काम किया था क्रांतिवीर श्री केसरीसिंह बारठ ने।  वही मेवाड़, वही महाराणा, वही  केन्द्रीय सत्ता, वही केन्द्रीय दरबार बदला कुछ नहीं था, बस बदले थे कुछ नाम और चेहरे।  प्रताप की जगह फतेहसिंह हो गया, अकबर की जगह लार्ड कर्जन, आगरा की जगह दिल्ली और पृथ्वीराज राठोड़ के स्थान पर थे केसरीसिंह बारठ।  बारठजी ने महाराणा मेवाड़ को संबोधित करते हुए तेरह सोरठे लिखे जो कि, इतिहास में ''चेतावणी  रा चूंटीया'' लिखे थे। (यहाँ पर एक बात पर थोडा सा मतिभ्रम हो जाता है कि, वे सोरठे  ''चेतावनी रा चुंगटया'' थे या ''चेतावणी रा चुंटीया'' वास्तव में यह कोई मतिभ्रम का प्रश्न नहीं है, बल्कि भाषा का है। शाहपुरा पड़ता है भीलवाड़ा जिले में यानि कि मेवाड़  हाडोती के अंचल में जहाँ की भाषा मारवाड़, थली  शेखावाटी अंचल से पूर्णतः भिन्न है। ऐसे में जहां मारवाड़, थली  शेखावाटी में जो अर्थ चूंटीया का है वही अर्थ मेवाड़ अंचल की भाषा में चुंगटया  का भी है। ऐसे में किसी भी प्रकार का वितंडावाद करना केवल दिमागी खर्च है वास्तविकता नहीं।) वास्तव में तो ये सोरठे महाराणा के मन को कचोटने के लिए, उन्हें वास्तविक स्थिति का भान कराने  के लिए ही लिखे गए थे 
       महाराणा को जब ये सोरठे मिले तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और वे दिल्ली जाकर भी कर्जन के दरबार में उपस्थित  नहीं हुए और हिंदवाणी सूरज की लाज बच गयी। जो लाज कभी पृथ्वीराज की हुंकार ने बचाई थी वही हुंकार केसरीसिंह बारठ ने भी भरी थी। मेवाड़ को इस बात पर गर्व है कि वहां पर संग्रामसिंह, महाराणा प्रताप, राजसिंह जैसे शासक हुए है, जिन्होंने रजपूती गर्व और गुमान को एक नई परवाज़ दी थी, परन्तु मेवाड़ को यह भी गर्व होना चाहिए कि, उनके पास महाराणाओं के शुभचिंतकों में पृथ्वीराज और केसरीसिंह बारठ जैसे लोग हुए जो उनका मरना पसंद करते थे बजाय उनके झुकने के।
                                यही नहीं बल्कि केसरीसिंह बारठ ने क्रांति की राह में अपने सहोदर भाई ठाकुर जोरावरसिंह बारठ, पुत्र प्रतापसिंह बारठ तथा अपने दामाद ईश्वरदान आशिया को भी झौंक दिया था। इतिहास में दो परिवार ही ऐसे हुए है, जिनका पूरा परिवार क्रांति की राह में ख़त्म हो गया। एक तो था सिखों के गुरु दशमेश गुरु गोविन्दसिंह जी का जिनके पिता, पुत्र और स्वयं भी क्रांति की राह में वीरगति को प्राप्त हो गए, दूसरा परिवार था केसरीसिंह बारठ का, जिन्होंने अपने भाई, पुत्र, दामाद सभी को क्रांति की ज्वाला में हॊम दिया।  
             केसरीसिंह बारठ ने राजस्थान में शिक्षा के प्रचार-प्रसार  तात्कालिक क्रांतिकारियों की हथियारों  पैसों की मदद के लिए जोधपुर के एक मठ के महंत, साधू प्यारेराम को धन देने के लिए कहा  साधू प्यारेराम कहने को तो भगवा वस्त्र पहनने वाला साधू था, परन्तु वास्तव में वह एक साधू नहीं स्वादू था, जो कि व्याभिचार में लिप्त रहता था। बारठजी ने उससे येन-केन-प्रकारेण धन लेने की योजना बनाई और अपने शिष्यों शान्तभानु लहरी, हीरालाल  भाई जोरावरसिंह को भेजा, वहाँ पर उन्होंने बहुत प्रयास किया परन्तु साधू प्यारेरम की तिजोरी की चाबियाँ उनके हाथ नहीं लगी क्योंकि साधू प्यारेराम स्वयं अहमदाबाद गया हुआ था  ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार उनको बारठजी ने आदेश दिया कि साधू को कोटा ले आये। कोटा में बारठजी ने साधू को समझाया कि, आपके पास अपार धन है उसमे से कुछ हमे दे दीजिये ताकि क्रांति की राह पर चलने वाले परवानों की मदद की जा सके, परन्तु वह साधू टस-से-मस नहीं हुआ  किसी भी प्रकार धन देने के लिए तैयार नहीं हुआ। ऐसे में उसे क्रांति की राह में जहर देकर परलोक भेज दिया गया, जिसकी हत्या के षड्यंत्र में शांतभानु  लहरी  हीरालाल को कालेपानी की सजा हुई तथा केसरीसिंह जी को बीस वर्ष की उम्रकैद कर हजारीबाग जेल भेज दिया गया। हालाँकि कोटा महाराव उम्मेदसिंह ने तो अंग्रेज सरकार से यह निवेदन तक कर दिया था कि, केसरीसिंह बारठ को भी अंडमान मे कालापानी भेज दिया जाना चाहिएपरन्तु अंग्रेज सरकार ने अपने ही नियमों के विरुद्ध जाने से मन करते हुए 42 वर्षीय बारठजी को कालेपानी की सजा पर नहीं भेजा। इससे सिद्ध होता है कि, क्रांति की राह और देशप्रेम के लिए हत्या जैसे जघन्य पाप को करने से भी क्रन्तिकारी नहीं डरते थे, और इतिहास में अनेकों बार यह सिद्ध हुआ है कि, राष्ट्रप्रेम और आजादी से बढ़कर कुछ नहीं होता और यही किया था केसरीसिंह बारठ ने।
                    इतिहासकारों ने केसरीसिंह जी बारठ पर जितना लिखा जाना चाहिए था उसका सतांस भी नहीं लिखा, जिसके अभाव में यह क्रांतिवीर इतिहास के पन्नों में दब कर ही रह गया। केसरीसिंह बारठ को कैद से छुडवाने के लिए कांग्रेस के अधिवेशन में स्वयं लोकमान्य तिलक ने यह प्रस्ताव रखा था कि कांग्रेस अंग्रेज सरकार पर दबाव बनाये कि वह केसरीसिंह बारठ को जल्द रिहा करे। इससे इस क्रांतिवीर की आजादी की लड़ाई में हैसियत का अंदाजा हो जाता है कि वह क्या चीज थे। स्वयं महात्मा गाँधी केसरीसिंह बारठ के परम मित्र थे। आजादी की लड़ाई में केसरीसिंह बारठ का योगदान अतुलनीय है तथा उनकी सोच  सिर्फ तात्कालिक समय के लिए थी बल्कि भावी समय के लिए भी वे प्रासंगिक थे। इतिहासकारों ने राजस्थान के साथ हमेसा अन्याय ही किया है, जिसके कारण चाहे जो रहे हो, परन्तु मानगढ़ हत्याकांड तो जलियांवाला बाग़ हत्याकांड से बड़ा था, विभत्स था। कुवंर प्रतापसिंह बारठ सिर्फ बाईस वर्ष की आयु में ही अंग्रेजी जुल्मों से शहीद हो गए थे और लगभग उसी आयु में ही भगतसिंह भी शहीद हुए थे। दिल्ली में धमाका ही तो भगतसिंह ने किया था और उसी दिल्ली में उनसे भी काफी पहले धमाका तो जोरावरसिंह बारठ ने भी तो किया था। आमरण अनसन ही तो गाँधीजी  ने किये थे और आहुवा के मैदान में राजस्थान के चारणों ने जो अनसन किया था और जो धरना दिया था क्या वो किसी से कम था ?
             परन्तु सच यही है कि,  तो हमारे राजस्थान के इतिहासकारों ने इस तरफ ध्यान दिया और ना ही बाहर के ही इतिहासकारों की नजर इन बातों पर कभी गई। जलियांवाला बाग़ आज राष्ट्रीय स्मारक है, भगतसिंह आज राष्ट्रनायक है, गांधीजी आज राष्ट्रपिता है। और हमारा मानगढ़ ? हमारे प्रतापसिंह बारठ ? जोरावरसिंह बारठ ? केसरीसिंह बारठ ? आहुवा  के आहूत वीर ? कहाँ पर है सब के सब और कहाँ पर है इतिहास में इनका नाम ?
                  हमे भगतसिंह, जलियांवाला बाग़ और गाँधीजी की महानता पर कोई शक नहीं है और ना ही कोई ऐतराज है, बल्कि हम तो ये मानते है कि यदि भगतसिंह नहीं होते तो राष्ट्र के युवा के खून में उबाल कौन लाने वाला था, सब तो अंग्रेजो की दुम  बन बैठे थे। ऐसे में हम कह सकते है कि, इन सबने तो भारत को भारत बनाने की राह आसान की थी। परन्तु फिर भी इतिहास से और इतिहासकारों से यह शिकायत जरूर है कि, क्या उन्होंने निष्पक्ष होकर इतिहास लिखा है 
               सोचने का काम ना सिर्फ इतिहासकारों का है बल्कि राजस्थान, इसके निवासियों का और यहाँ के बौद्धिक जन का भी है कि,
          क्या उन्होंने अपने राजस्थान और अपने वीरों का, अपने क्रांतिवीरों का सम्मान किया है 

                        यदि नहीं तो क्यों ? प्रश्न बड़ा है पर जबाब --------------- ?

आपका,

मनोज चारण