Thursday, March 3, 2016

नमस्कार दोस्तों !

आज जब हिन्दी साहित्य को पढ़ रहा था तो अग्निपुराण का एक श्लोक पढ़ने मे आया तो आज इसी श्लोक पर ही चर्चा कर लेते है, -


नरत्वं दुर्लभं लोके, विद्या तत्र सुदुर्लभा।
कवित्वं दुर्लभं तत्र, शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा॥
-अग्निपुराण

अर्थात इस लोक में मनुष्य होना बहुत ही दुर्लभ होता है, उसमें भी मनुष्य होकर विद्या-अर्जन करना और भी दुर्लभ काम होता है, विद्यावान होकर कवि होना उससे भी दुर्लभ और कवि होकर कवित्व की शक्ति प्राप्त करना तो महान दुर्लभता है।

सीधा सा अर्थ है, की चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद हमे ये मनुष्य शरीर मिलता है और हमारा विद्या-ग्रहण करना भी एक महानता का काम होता है। विद्यावान तो इस दुनिया में बहुत से मिल जाते है लेकिन उन लोगों में कवि बनने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिलता है। हाँ कुछ लोग अभ्यास करके कवि बन जाते है, लेकिन कवि बनना और कवि होना बहुत अलग होता है। किसी भी भाव को जीवंत करना कवि ही कर सकता है, उगते सूर्य को करोड़ों लोग देखते है, ढलते भी देखते है, पंछियों का कलरव बहुत लोग सुनते है, लेकिन इस सबके साथ तादात्म्य सिर्फ कवि ही कर सकता है। किसी के आंसुओं को अपनी आँखों से बहाने का काम कवि ही कर सकता है। किसी के दुख को बांटने का काम तो बहुत से लोग कर सकते हैं, लेकिन किसी के दुख से खुद को साझा करने का जो हुनर कवि के पास होता है वैसा हुनर होना ही उसे समाज में अलग मुकाम पर खड़ा कर देता है। आम जन को नहीं दिखता, आमजन को नहीं महसूस होता वो कवि को दिखता है, महसूस होता है। इसलिए कवि इस समाज में हमेशा से श्रद्धा का पात्र रहा है।
लेकिन आज के मंचों के कुछ खिलंदडों ने कवि का मतलब मज़ाक बना के रख दिया है। ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोभी और लालची अध्यापकों ने शिक्षक को मज़ाक बना दिया है। इसमें सुधार भी हमे ही करना होगा और फिर से कालीदास और तुलसीदास के चरित्र को जीवंत करना होगा।

- मनोज चारण (गाडण) “कुमार”
रतनगढ़ (चुरू)

Friday, February 26, 2016









सभी को सादर जैश्री हिंगलाज ! 

                                      आज 26 फरवरी है, देश के एक महान क्रांतिकारी और विलक्षण व्यक्तित्व वीर सावरकर की पुण्य-तिथि है। क्या हमे याद है ? नहीं, तो क्यों नहीं ? क्योंकि हमे हमेशा यही बताया गया कि, वीर सावरकर का भारतीय क्रांति में योगदान नहीं के बराबर था, जिस सेल्यूलर जेल में उन्हे कोल्हू मे बैल कि जगह जोता गया, उस जेल से उनके नाम कि पट्टिका तक पीछे कि सरकार के एक मंत्री ने हटा दी। क्यों? देश को उस महान हुतात्मा को बार-बार प्रणाम करना चाहिए जिसने अपनी ज़िंदगी में दो बार काले-पानी कि सजा को भोगा। वीर सावरकर ही वो पहले हिंदुस्तानी थे जिन्होने सन्न सत्तावन कि क्रांति को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम बताया था, जिस तथाकथित इतिहासकार मात्र सैनिक विद्रोह कह कर अस्वीकार करते है। 
                           ऐसी पुण्यात्मा को मेरा वंदन और बार बार प्रणाम।


                                                                                शेष फिर कभी ..................................। 


मनोज चारण (गाडण)  "कुमार"
लिंक रोड, रतनगढ़ (चूरु) 
मो. 9414582964

Thursday, April 23, 2015

सादर जै श्री अम्बे ! 

           मेरा देश जो कभी कृषि प्रधान देश कहलाता था, मेरा देश जो जतियों और सतियों का देश कहलाता था, मेरा देश जहां पर किसान हल जोतता था तो सीता जन्म लेती थी, मेरा देश जिसमे भगवान भी गोपाल बन कर पैदा हुए, मेरा देश जिसने किसान के बेटों को देश के सर्वोच्च पदों पर बैठाया, मेरे उस देश के एक मजबूर बेटियों के बाप को, मजबूर माँ के बेटे को, मजबूर गृहणी के मजबूर पति को और मजबूर देश के मजबूर किसान को जब देश की राजधानी में संसद के ठीक पास में आत्महत्या के लिए फांसी खानी पड़े तो आँखों में आँसू नहीं आते बल्कि अंगारे बरसने लगते है। इस घटना पर कोई भी कुछ नहीं बोले, सब अपनी-अपनी ढपली पर अपनी राग आलाप रहे है ऐसे में ना तो मुझे नायिका के केश सुहाते है और ना ही कोई हास्य रस की फूहार ही अच्छी लगती है। इस देश की नपुंसक सरकार के खिलाफ सिर्फ आक्रोश ही आक्रोश छलक़ता है। राजस्थान के एक किसान ने देश को आईना दिखा दिया है, उस दिलेर ने अपने गाँव-ढाणी में अपनी इहलीला खतम नहीं की बल्कि छाती पीट-पीट कर अपने को किसान हितैषी बताने वालों के गढ़ ने जाकर राजस्थानी जौहर, तागा, केसरिया की परंपरा का निर्वहन किया है, मैं नमन करता हूँ उस हुतात्मा को जिसने इन नीचों को नंगा किया है। उस वीर की शहादत पर मेरी चंद पंक्तियां समर्पित करता हूं -  

देश का जनाज़ा है ये कैसा है तमाशा जाने,
देश का किसान आत्महत्या पे उतारू है।
कैसी है समस्या जाने अन्नदाता परेशान,
देश की सरकार भी अब हो गई  बीमारू है।
खो गये है गांधी बाबा, खो गए है शास्त्री भी,
खो गए पटेल सरीखे किसान रखवारु है।
अब तो बचा है देश में केवल बाजार देखो,
और बचे है वो सारे नेता जो बाजारू है।१। 
राजधानी मौन है और जनता में है खौफ भारी,
देश की जनता ने देखो उंगली उठाई है।
देश की गद्दी पर बैठे सारे भांड एक जैसे,
सारे के ही सारे खाते रबड़ी मलाई है।
नेताओ के साथ देखो मिल गया आसमां भी,
जिसने बारिस के संग कहर बरसाई है।
अब तो सुनो तुम कान्ह कन्हाई मेरे,
नहीं जो सुनोगे तो ये तेरी जग हँसाई है।२।  
हत्या के दोषी है सारे देश की जो सरकारे,
देश के किसान की ना कोई सुनवाई है।
कोई पैर पकड़ाता, कोई करता है बाते,
किसी के भी देखो मन दया नहीं आई है।
सब करते है देखो झूठी ये लफ्फाजी अब,
किसी की भी आँख जरा सरम न हयाई है।
लूट-लूट खा गए जो देश को वो जाने कैसे,
कर रहे है देखो इस देश की रहनुमाई है।३।
अब तो संभल जाओ छप्पन इंची छाती वालों,
आने लगी अब सबके सामने सच्चाई है।
बंद करो प्रलाप और झूठी बाते सारी,
मान जाओ गलती इसी में ही भलाई है।
कर रहे आत्महत्या देश में किसान देखो,
जग मे ये तूने कैसी छवि अब बनाई है।
छप्पन इंची छाती वालों देश की गद्दी को छोड़ो,
देश की जनता में अब यही मांग छाई है।४।

- मनोज चारण (गाडण) ''कुमार'' कृत  

Sunday, March 22, 2015

माँ की स्तुति

राग रंग कछु नहीं जाणू, जाणू कोणी छन्द। 

बिना बन्द रा छन्द माँ, अरपण है जगदम्ब।। 

प्रथम ईश नै ध्यायके मैं ध्याऊँ गजानन्द। 

करणी माँ  हिरदै मै बसो,शारद बगसो छन्द।।


थारी मूरत बड़ी है सोवणी, माँ सूरत रूप अनूप।           

थारै हाजर सब खडया माँ, सुर-असुर-नर-भूप।।          

माँ थासूं सूरज च्यानणो, अर चंदा रूप उजास है।             

माँ थारै मढ़ री जोत है, अर काबा आसू-पास है।।          

माँ ओरण है मनभावणी, अर छटा घणी सरसावणी।।  

हो देशनोक री आप धिराणी, माँ कीरत गाउँ चारणी।। 

कर जोडया कथना करूँ, माँ कीरत गाउँ आपरी।         

चरण  शरण  दे  चारणी,  अर लाज राखजे खाँप री।।


चारण चरणा शरण पड़यो, माँ बेगी आय उबार।           

सिंघ  चढ़ी  झट  आवजे, माँ हेलो करै कुमार।।


मनोज चारण “कुमार”


Wednesday, October 15, 2014

दीवारें


          अक्सर दीवारें दो लोगों के बीच में आ जाया करती है। आखिर क्यों बनती है ये दीवारें ? कौन बनाता है इन्हें ? समझ में नहीं आता किसे दोष दूँ।
         समाज को, परम्परा को, आज के वातावरण को या खुद इंसान को ? परम्पराएँ दोषी कैसे हो सकती है, क्योंकि परम्पराएँ डालता कौन है ? समाज किससे बनता है और वातावरण बनाता कौन है ? आज से नहीं वर्षों और सदियों से ही नहीं अगर कहें तो वास्तव में मानव का जन्म हुआ है तब से ही मनुष्य स्वयं ही तो यह सब बनाता आया है।
         कभी वातावरण का निर्माण तो कभी समाज का, कभी परम्परा का तो कभी मूल्यों का। इन सबने मिलकर खड़ी की है ये दीवारें।
         दीवार आखिर है क्या ? इसे तो कोई भी फांद सकता है। क्या वह कुछ बोलकर कहेगी ? शायद नहीं ! क्योंकि दीवारें बोलती नहीं, पत्थर बोला नहीं करते। लेकिन पत्थरों से बनने वाले गवाक्ष बोलते है, अक्सर बोला करते है। इन गवाक्षों से झांक कर ही तो अक्सर लोग परम्पराओं की दुहाई दिया करते है। किन्तु, वे स्वयं नहीं जानते कि वो इस गवाक्ष में छुप कर क्या एक नयी परम्परा को जन्म नहीं दे रहे है। आखिर कब तक यूं ही परम्पराओं के नाम पर लोगों को मिलने से, जानने से और पहचानने से रोका जाता रहेगा।
        कहीं से, कभी तो शुरुआत करनी होगी। जब शुरुआत करनी ही है तो फिर हमसे ही क्यों नहीं ? हम ही क्यों न मिलें ये गवाक्ष पीछे छोड़ कर, दीवारें तोड़ कर। एक उन्मुक्त वातावरण में, के खुले आसमान तले, एक दीवार रहित धरा पर। क्यों नहीं सिलसिला हम ही शुरू करें..............दीवारों को तोड़ने का।

                                       मनोज चारण
                                     मो. 9414582964 

Thursday, December 19, 2013

क्या भारत अपने 2500 साल पुराने लोकतन्त्र की तरफ बढ़ रहा है...........?

नमस्कार !

                आज कुछ बाते भारत के लोकतंत्र के बारे में कर लेते है, बात इतिहास से शुरू करते है, इतिहास मे हमे कुछ उदाहरण मिलते है की चन्द्रगुप्त मोर्य, चन्द्रगुप्त द्वितीय, हर्षवर्धन, अकबर, महाराजा रणजीतसिंह, महाराजा गंगासिंह आदि को जब-जब कुछ विशेष बात पता करनी होती थी, तो वो फिर जनता के बीच भेष बदल कर जाते थे, वहाँ पर उनको अपनी समस्या के बारे मे या राज-काज कैसे सुधरे इसके बारे मे समाधान मिलता था, और वो उसी के अनुरूप अपना फैसला लेते थे। ये सभी राजा अपने समय के ही नहीं बल्कि हर समय के लिए नजीर बन चुके है। भले ही इनका राज्य कितना ही छोटा रहा हो या बड़ा रहा हो। 
              भारत कि आजादी के समय  हमारे भारत का संविधान जब बना तो वो एक तरह से जनमत संग्रह की ही उपज था, इसी प्रकार विश्व मे अनेक बार जनमत संग्रह होते आए है। दिल्ली के निर्भया-दामिनी केश मे यही तो हुआ था, या फिर चाहे जेसिका लाल हत्याकांड मे हुआ हो।
               भारत में पंचायती राज को काफी महत्व दिया जाता है, गांधीजी ने तो पंचायती राज को ही असली सुराज कहा था।  पंचायती राज मे भी ग्रामसभा की अवधारणा है जो यह तय करती है कि, ग्राम कि हर समस्या को सुलझाने मे हर ग्रामवासी का योगदान होना चाहिए, और फिर ये सब आखिरी तो जनता का लोकतन्त्र मी भागीदारी का ही तो प्रमाण है।
               यदि ये सब सही है तो फिर आम आदमी पार्टी द्वारा अपने सरकार बनाने या ना बनाने के फैसले पर एक बार फिर जनता कि सलाह ली जाती है तो किसी के भी पेट मे दर्द क्यों होता है ? क्या इस देश मे फैसला लेने का हक किसी साहजादे, साहबजादे, महारानी, महाराजा को ही है। ये तो वही नजीर हो गई, "ना खाता ना बही, जो केशरी कहे वो सही।"
                किसी पार्टी को निर्देश कहीं से मिलते है, किसी को कहीं से। कोई तो अपने नेता को देश के 120 करोड़ जनता का प्रतिनिधि बताते है, कोई अपने को, और सच ये है कि जब चुनाव के बाद वोट के प्रतिशत की  भागीदारी देखे तो पता चलता है कि देश कि सरकार मात्र 30 प्रतिशत वोट वाले लोग चला रहे है, ये लोकतन्त्र कि सीमा है, कमी है। इसे स्वीकार करना चाहिए, इसमे सुधार करना चाहिए।
                मुझे आइडिया कंपनी का वो विज्ञापन याद आता है जिसमे एक विधायक नेत्री अपनी जनता से एसएमएस कर पूछती है कि पुल बनना चाहिए या नहीं। जनता जबाब देती है और पुल बन जाता है।  यदि वही प्रक्रिया आम आदमी पार्टी भी अपनाती है तो फिर गलत कहाँ है ?
                क्या ये लोकतन्त्र मे फिर से वही अवधारणा तो नहीं बन रही जो कभी वैशाली गणतन्त्र में हुआ करती थी, या वज्जी संघ मे हुआ करती थी। जब हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र कि दुहाई देते है तो फिर हमे दुनिया के सबसे पुराने लोकतन्त्र कि अवधारणा को भी जीना चाहिए, जो हमारी उन्नत स्थिति थी। हम क्यों नहीं दुनिया के सामने एक और नजीर रख सकते कि भैया देखो ये भी होता है, इस देश में। सच मे गांधी के स्वराज कि तरफ केजरीवाल का ये कदम स्वागत के योग्य है।
                कारगिल युद्ध परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टेन मनोज पांडे ने अपनी डायरी में लिखा था कि, "किसी लक्ष्य को प्राप्त करना तो महान होता ही है, पर किसी महान लक्ष्य कि प्राप्ति मे असफल होना कोई बुरी बात नहीं, क्योंकि महान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उठाया गया कदम ही काफी महान होता है।"
                  तो केजरीवाल के इस कदम का स्वागत होना चाहिए, जिसने पिछले 2 साल में राजनीति कि 60 सालों से जंग खा चुकी परम्पराओ पर रेजमाल तो घिसा है, कम-से-कम किसी ने हिम्मत तो की, जो इन सड़ती परम्पराओ को धूप मे रखने की कोशिस तो की है।
क्या ये सही नहीं है........................... ?
यदि नहीं तो क्यों नहीं ......................?
यदि हाँ तो फिर क्यों नहीं मिले इसे समर्थन ..............................?
 
सादर नमस्कार !
 
मनोज चारण। 

Friday, December 6, 2013

क्या सोचता है युवा … 

नमस्कार ! 

            कल मैंने देखा कि जिस युवा की बात लोग  करते रहते है वो क्या वास्तव में ही कुछ कर सकता है समाज के लिए या फिर लोग यूँ ही चिल्लाते है।  मैंने उस युवा को कल देखने के बाद इस पर विचार किया कि सच में युवा हमें जैसा दीखता है वैसा है नहीं। 
             दिखने का तो क्या है सूरज भी ग्रहण के वक्त काला दिखता है, पर सच में होता नहीं है, यही बात युवा पर भी लागु होती है। युवा हमें अपाचे बाइक पर बैठा, सिगरेट का धुँवा उड़ाता, काला चश्मा लगाये, कानो में इयर फोन लगाये, नाइके की टोपी लगाये और दीन-दुनिया से बेखबर दिखता है। 
              पर कल मैंने देखा के अलमस्त सा लगने वाला ये युवा मन ही मन डरा हुआ है, न सिर्फ आज से बल्कि इस समाज से, कल सामने आने वाली बेरोजगारी कि समस्या से भी।  इसीलिए वो झुक जाता है जब देखता है किसी मंदिर को, किसी मस्जिद को भी।  अपाचे चलाने वाला युवा उतरता है, गोगल को पीठ पीछे सलमान कि तरह डालता है, चप्पल खोलता है और गोगाजी कि मेड़ी पर बड़ी शिद्दत से नमन करता है। 
              मुझे लगता है कि ये वो युवा है जिसके मन में सपनीला, चमकीला रजतवर्णी संसार तो है पर कहीं पर मन कि गहराइयों में भारतीय संस्कार भी दबे है, छुपे है।  यदि इस युवा पर भारत गर्व करता है तो सही है।  
        पर हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि कहीं ये किसी डर से तो नहीं झुक रहा है, यदि ऐसा है तो फिर समाज को सोचना चाहिए, युवा के मन में सकारात्मकता होनी चाहिए डर नहीं। हमें इसे गहराई से समझना पड़ेगा। 

                                                जय श्रीअम्बे !


                                                                 मनोज चारण